Sunday, November 30, 2014

Mahila dibbe ka safar.


महिला डिब्बे का सफ़र
पिछले दिनों कुछ ऐसा हुआ की मुझे एक सुबह पता चला की रात की गाड़ी से ही मुझको दिल्ली पहुचना बहुत ज़रूरी है I हर तरफ पता करने के बाद भी मुझको कन्फर्म टिकट नही मिला , तभी मुझको मेरी एक महिला मित्र ने बताया आप कानपुर से हि रात मे चलने वाली ट्रेन के ‘महिला डिब्बे’ मैं बैठ के चले जाईये I उसने प्रस्ताव दिया की उसका बेटा मुझे ट्रेन मे बिठा आयेगा I मैंने तो कभी सुना हि नही था की कानपुर से चलने वाली दिल्ली के ट्रेन मे महिला डिब्बा भी होता है I खैर जो भी हो मैं जब स्टेशन पहुंची तब तक वह गाड़ी प्लेटफार्म पर नही लगी थी.मुझको थोडा अजीब लग रहा था क्योंकि कभी मैं बिना रिजर्वेशन के इस त्तरह गयी नही थी I मेरे मित्र का बेटा जो मुझे मामी बुलाता है उसने बोला - मामीजी आप टेंशन मत करिए महिला डिब्बा येही लगता है आप बस किसी तरह उस डिब्बे मे घुस कर खिड़की वाली सीट ले लीजियेगा I थोड़ी देर बाद जब गाड़ी प्लेटफार्म पर लगी, जहाँ पहले कोई नही दिख रहा था वही एकदम से महिला डिब्बे के समीप महिलाओ, बच्चो एवं कुछ पुरुषो की अच्छी खासी भीड़ आ गयी.I सभी एक साथ महिला डिब्बे मे घुसने लगे उसी आपाधापी मे किसी तरह से मै भी ट्रेन मैं चढ़ गयी और उस सीट पर पहुच कर बैठ गयी जिसको मेरे साथ के बच्चे ने बाहर से पहले से हि बैग रख कर कब्ज़ा कर लिया था, इमरजेंसी वाली खिड़की खोलकर!!!.....पता नही कैसे!!
मेरे बैठने के साथ साथ मैंने पाया की मिनटों मैं हि पूरी बोगी हर उमर हर धर्म और हर तबके के महिलाओं बच्चो से ठसा ठस भर चुकी थी I उसमे कुछ औरतो के साथ पुरुष भी साथ उठ आये थे तस्सल्ली करने को की उनके परिवार वालों को ठीक से सीट मिली की नही Iमेरी सीट खुली हुई खिड़की पर होने की वजह से मेरा स्थिति कुछ समय के लिए साथी हाथ बढ़ाना टाइप की हो गयी थी I लोग बाहर से उस सीट पर सामान फेंक रहे थे और मज़बूरी मे खुद को बचाने के लिए मुझे उन्हें पकड़ना था I उस खुली खिड़की से करीब बारह/पंद्रह छोटे बड़े बैग अन्दर करने के बाद वही से बच्चो के घुसने का सिलसिला शुरू हुआ...उनकी भी मैंने मदद की और उनकी माओं तक पहुचाया जो डिब्बे मे पहले हि घुस चुकी थी . अब खाना और पानी,फल वगेरह भी आने लगेI . पूरे डिब्बे मे गहमा गहमी का माहौल था चिल्ल पों चीख पुकार मची हुई थी I खैर इतने देर मैं दो तीन रेलवे पुलिस वाले डिब्बे मे आयें और लाठी चटकते हुए महिला डिब्बे मे घुसे हुए पुरुषो को उतर दिया और हिदायत देकर गए –दरवाजा अन्दर से बंद कर लो और किसी के लिए कोई भी दरवाजा खोलना नही I पुरुष उतर जाने के बाद भी खिड़की से चिल्ला रहे थे.`संगीता ठीक से बैठ गयी न?``अम्मी आप लड़ाई मत करना`!...`दीदी कुछ चाहिए`हम अगले डिब्बे मैं है.’.....’अनीता तुम्हारी अम्मा को बोल दो हमने खाना खा लिया`.....अमीना तुमने ताला लगाया था न?...अम्मी हमारी टिकट तुम्हारे पास है`......मुझे लग रहा था एक बड़ा हि दिलचस्प फिल्म देख रही हूँ .और इसके बाद अन्दर से उस प्रश्नों के उत्तर...`हाँ भैया ठीक से बैठ गयी...`तू चुप कर हमही तो लड़ा करे है सबसे`(पर सच मैं वो माँ बेटी ने सबसे ज्यादा लड़ाई कि पुरी रात)...अनीता जिसकी माँ को बोलना था की उसके पिता ने खाना खा लिया....वह तो नीद मैं गिरि जा रही थी...पर मुझको लगा उसकी माँ ने सुन लिया...और धीरेसे..बोली ठीक है...अमीना ने ताला लगाया की नही इसका मुझे तो पता नही पर अमीना को मैं ने देखा कम उमर की लड़की खूब सजी हुई थी चमकीला सूट,चप्पल कपडे से मैच करता हुआ.....बड़ी संभाल रही थी अपने छोटे भाईओं को.`भैया बैठ जाओ....खड़े क्यूँ हो?
....आंटी आप कहाँ जाएँगी??...मैं चौंक गयी आवाज़ से.देखा मेरे सामने वाली सीट पर एक लड़की बैठी थी.बाल लडको जैसे कटे थे,लडको जैसे कपडे भी पहनी थी....मैं बोली दिल्ली..और तुम... वह बोली....दिल्ली जा रही हूँ रेलवे का एग्जाम देनेI.टिकट कन्फर्म नही हुआ तो क्या करूँ एइसे हि जाना है....साधारण सी थी वह पर आँखों में गज़ब की चमक थी.
ट्रेन छुटने को हि थी कि किसी ने जोर जोर से दरवाजा पीटना शुरू किया साथ हि वो चिल्ला रहा था – खोलो खोलो पुलिस है !...जो महिला दरवाजे के पास थी उसने घबरा कर दरवाज़ा खोल दिया एक लम्बा सा खाकी वर्दी वाला अन्दर आकार हड़काने लगा - मेरी इस बोगी मैं ड्यूटी लगी है. किसी ने कोई भी झगडा किया तो मुझसे बुरा कोई नही होगा..मैं एक फ़ोन करूँगा पूरी फ़ोर्स आ जाएगी और उसको बीच रास्तें से उतार दिया जायेगाI
अब पूरी बोगी मैं अजीब सी शांति छा गयी मुझे लगा की सच मे साधारण पब्लिक खाकी वर्दी से कितना डरती है जैसे हम सब अपराधी है...नार्मल बात करना भी भूल गए सबI इसी उहापोह के बीच पता हि नही चला ट्रेन स्टेशन से छूट चुकी थी I
वर्दीधारी अन्दर आकर एक लड़की के बगल मैं थोडा जगह बना कर बैठ गया...उसके कपड़ो से शराब की बू आ रही थी....उस लड़की को परेशानी तो हो रही थी पर कुछ बोल नही पा रही थी शायद, थोड़ी देर मे उसने अपने भाई जो अगले डिब्बे मैं था उसको फ़ोन करके बताया तो उस लड़की के भाई ने कहा मेरी उससे बात करवाओI..उस लड़की ने वर्दी धारी से कहा - मेरे भैया से बात कर लीजिये...पहले तो उसने मना किया फिर फोन पर उसके भाई को गाली देने लगा...तुम होते कौन हो मुझसे पूछने वाले की मैं कैसे इस डिब्बे मैं बैठ गया.तुमको अन्दर करवा दूंगा...फिर फ़ोन रख कर उस लड़की को आखे दिखाने लगा `तुमने क्यूँ बताया?हम क्या तुमको कुछ कह रहे थे? तुम जानती नही किस्से पंगा लिया है एइसा मारूंगा की.......`..उसके आगे जो बोला लिखने लायक नही है.......सुन कर बड़ा बुरा लगा की कैसे बात कर रहा है..पर मेरे सामने बैठी लड़की एक दम चीख उठी `माइंड योर लैंग्वेज....आप ठीक से बात करिए.. लेडिस से कैसे बोलना चाहिए आपको नही पता है`?? खाकी वर्दीवाला कहने लगा- आप से नही बोल रहे है ज्यादा मत बोलिए.हम आपको भी देख लेंगे..`..पर वह लड़की कहाँ मानने वाली थी उठ के दुसरे तरफ चली गयी और जाकर चैन खींचने लगी....मैंने आशचर्य से देखा की सारे औरत उसको मना करने लगी`अरी पागल हो इनसे पंगा न लो`...पर वह मानी नही ....बोली जो होगा मैं झेलूंगी.... बोली.` इसने सोचा हम डर जायेंगे अभी देखियेगा इसे पता चलेगा, अरे लेडिस डिब्बे मैं महिला पुलिस होती है.ये कोई फर्जी व्यक्ति है I यह कहती हुई वह चैन पर जोर लगाकर लटक गयी I अब गाड़ी धीरे होकर रुक गयी डिब्बे मे अजीब सा सन्नाटा पसर गया I बाहर घुप्प अँधेरा था थोड़ी देर बाद बाहर हल्की आवाज़े और रौशनी की लकीर दिखी दो टीटीई आ पहुचे और टॉर्च दिखा कर आवाज़ लगाई - अरे चैन क्यूँ खीचा, किसने खिंचा ??गाड़ी लेट करा दोगे क्या?जैसे मजाक मजाक मैं किसी ने चैन खीच दिया हो. उनका लहजा मुझको बिलकुल अच्छा नही लगा.महिलाये खिड़की से घटना का बयान कर रही थी कुछ कुछ बोल रही थी .पर टीटी लोगो को तो जैसे सुनना हि नही था .एक महिला की कैसे इज्जत की जाती है जैसे किसीने सिखाया हि नही I वे अब सीधे तू तड़ाक पर उतर आये एवं बदतमीज़ी से बात करने लगे I जब किसीने बताया एक खाकीवर्दी वालावाला पुरुष डिब्बे मे जबरदस्ती घुस आया है तो वोह और चिल्लाने लगे - बताया था की किसी को दरवाजा मत खोलना....तु सब है हि इस लायक
की कोई भी आकार बैठ जाय अब झेलो I
अब मुझसे रहा नही गया मैं टीटी लोगो से बोली - सर एक खाकि वर्दीधारी जब बोलता है तब तो सब सुनेंगे ही , प्लीज इनको उतार दीजिये क्या पता कोई फ्रोअड है क्यूंकि नेमप्लेट भी नही है....मेरा सर कह के बोलना उनको भा गया या शायद उनको उनकी ड्यूटी याद आ गयी होगी टॉर्च से इशारे करके अन्य डिब्बे मे मौजूद फिर रेलवे पुलिस को बुलवा कर वे सब डिब्बे मे घुसेI उधर डिब्बे मे मौजूद वर्दी धारी सन्नाटा साधे पड़ा था जैसे सो गया हो I उनलोगों ने आकर उसको जगाने की कोशिश की पर वो कुछ नही बोल रहा था पुलिस वालो ने उसे पकड़ कर डिब्बे से उतारा और साथ ले गए I ऐसा लगा जैसे एक बोझ उतर गया. मैंने सबसे कहा कहा आप सब लोग ताली तो बजाइए.इतना अच्छा काम किया इस बच्ची ने. तब जाकर कुछ महिलाओ ने थोड़ी सी ताली बजाई मुझको इस बात का एह्साह हुआ की सामान्य महिलाये अभी भी बहुत पिछड़ी हुई है कोई भी साहसिक कार्य स्वयं करना तो दूर ऐसे किसी कार्य की तारीफ करना विशेस कर जिसमे महिला शामिल हो उसकी भी हिम्मत नही जुटा पातीI
अब ट्रेन पुनः चल पड़ी थी डिब्बे मे .अचानक किसी की आवाज़ आयी अरे मामी गाना सुनाओ ना....मैंने देखा एक लड़की अपने मामी से मनुहार मैं लगी थी.और उसकी मामी रात को दो बजे गाने लगी`ये गोटेदार लहंगा निकलू जब डालके`....हाय रे हाय नीद नही आय.....इतनी रात कोई एइसे गाने कोई कैसे गा सकते है....पर सभी उसके गाने को एन्जॉय कर रहे थे.. ट्रेन ने अब गति पकड़ ली थी I मै खिड़की पर सर रख कर सोने की कोशीश करने लगी शायद थोड़ी सी नीद भी आने लगी थी तभी किसी की आवाज़ से मेरी नीद उड़ गयी - अरे अपने आप को महारानी समझ रही हो क्या?...सर पर चली आ रही हो!!!
देखा दो औरते आपस में लड़ रही है.. यह समझ आया की बात सिर्फ इतनी थी की एक औरत जो की टॉयलेट के पास बैठी थी के ऊपर दुसरी का पैर लग गया था..अब इतने कम जगह और रात मे लोगो को टॉयलेट तो जाना हि था I जो लोग टॉयलेट के पास बैठे थे वह ऐसे व्यव्हार कर रहें थे जैसे टॉयलेट उनकी अपनी जाय्दाद है जो भी वहां से जाने की कोशिस कर रहें थे उसको बिना लड़ाई किये जाने नही दे रहे थे खूब तू तू मैं मैं होती रही.मैं भी मूक दर्शक बनी सुनती रही.मै समझ चुकी थी इस माहौल मे सो नही पाऊँगी I
मेरे सामने जो लड़की बैठी थी बोली - आंटी अगर मेरी रेलवे मैं नौकरी लग गयी तो मैं इस लेडिस डिब्बे को थोडा बड़ा करवाने की कोशिस करुँगी...इन महिलाओं को कितनी तकलीफ उठानी पड़ती है.इनके बारे मैं क्यूँ कोई नही सोचता??....इस देश मैं हर व्यक्ति के पास इतनी सुबिधा उपलब्ध नही होती...जनरल पब्लिक इस तरह से हि चलती है.....सरकार को कुछ तो सोचना चाहिए...मैं तो जरुर कुछ करुँगी.मैं उस लड़की को उसका नाम नही पूछ पायी थी पर उसकी बड़ी बड़ी आँखों मे जो आत्मविश्वास मैं ने देखा कभी नही भूल पाऊँगी मुझे लगा देश बदल रहा है नयी पीढ़ी बदल रही है
एक पंक्ति याद आ गयी...अभी न पूछो हमसे मंजिल कहाँ है?अभी तो हमने चलने का इरादा किया है,ना हारे है ना हारेंगे कभी,ये किसी और से नही खुद से वादा किया है.....

--सोनाली बनर्जी

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